Monday, October 6, 2008

171 वां दिन

प्रतीक्षा, मुंबई अक्टूबर 6, 2008 10:59 pm

ज़िंदगी अब फिर पर लौट रही है। एक ढर्रे पर। एक नियमत तौर पर। ये सुबह तड़के ही आप को झकझोड़ देती है। मैं सुबह 3 बजे उठ जाता हूँ - यह सोचकर कि 6 बज गए हैं, और मुझे उठ कर जिम जाना चाहिए, व्यायाम करना चाहिए, दिल पर जोर डालना चाहिए, अच्छी तरह से साँस लेनी चाहिए। इससे काफ़ी ऊर्जा मिलती है।

पर जब काम शुरू होता है, तो मुद्दें और परिस्थितियां, प्रतिबद्धता और राय, अटकलें और सलाह, सब गड्डमड्ड हो कर, मिलजुल कर एक ऐसा विशालकाय पीड़ादायक पहाड़ बन जाते हैं, जो मानो आपकी चमड़ी और आत्मा को उधेड़ कर ही रख देगा।

इतनी नफरत और बुराई भरी हुई है उनमें जो कि प्रकट रुप से किसी खोज में हैं। लेकिन वे केवल द्वेष ढूंढने में ही सफल हो पाते है। शरीर, मन और आत्मा के समन्वय का कितना कुछ हिस्सा जाया हो जाता है एक विनाशकारी मन के निर्माण में। एक ऐसा मन जो कि सच्चाई को नकारता रहता है। एक प्रतिगामी शरीर जो कि बिना सोचे समझे हर किसी को अयोग्य ठहराने का प्रयास करता है। भावी पीढ़ी के लिए एक ऐसा विलेख लिख जाता है जिसकी न तो किसी को ज़रुरत है और न ही इच्छा।

ऐसे मन और ऐसे विचार और ऐसी अभिव्यक्ति से हमारा सामना क्यों होता है? क्या ये हमारी पूर्व-निर्धारित किस्मत और परिस्थिति है। क्यों बुराई की परछाई पड़ती है अच्छाई पर? क्यों बुरे का कमीनापन शुद्ध साहस को गंदा कर देता है। तकि त्रुटिपूर्ण अस्तित्व के दाग़ को एक स्थायित्व मिल सके?

मैं कुछ नाजायज़ सवाल पूछ रहा हूँ और अवांछित से भी।

समझदारी तो इसी में है कि मैं एक सामान्य और श्रमसाध्य रुप में पेश आऊँ। खैर, अभी के लिए …

"जो बाहर देखता है वो सपने देखता है, जो अंदर देखता है, वो जग जाता है।"

"एक छोटा सा बिंदु एक बड़े वाक्य पर विराम लगा देता है। लेकिन … 3 बिंदु मिल जाए तो वे उस वाक्य को एक निरंतरता दे सकते हैं। कमाल है, लेकिन सच है कि हर अंत एक शुरुआत हो सकता है। "

"कभी कभी भगवान हमसे हमारी क्षमता से ज्यादा काम करवाता है। वह हमारी परीक्षा लेता है। क्योंकि उसे हमारे उपर हमसे ज्यादा विश्वास है।"

"विजेता मौके ढूंढता है और जब वे नहीं मिल पाते हैं तो खुद ही उन्हें बना लेता है।"

"दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।"



नमस्कार, आदाब, सत श्री अकाल, शुभ रात्रि, शब ए खैर, गुड नाईट!!

अमिताभ बच्चन
http://blogs.bigadda.com/ab/2008/10/06/day-171/

1 comment:

Renuka Bhargava said...

Sir ji aapko sat sat naman sab aapko kyu pasand karete pata hi me aapko isliye pasand karti hu ki mahanayak aaj bhi apne babuji ke bete hi